बिहार का काला इतिहास: दलेलचक-बघौरा नरसंहार57 अमानवीय मौतें, पीपल के पेड़ से लटकाए गए राजपूत, फिर नहीं लौटी कांग्रेस सरकार

बिहार। बिहार के औरंगाबाद जिले के दलेलचक और बघौरा गांवों में 27 मई 1987 को हुए दलेलचक-बघौरा नरसंहार ने राज्य के इतिहास में एक काला और दर्दनाक अध्याय जोड़ा। उस एक रात में लगभग 57 निर्दोष लोगों की निर्मम हत्या की गई, जो आज भी उस इलाके की जनता के दिलों में गहरा घाव बनकर मौजूद है।यह हमला तब हुआ जब 500 से 700 की संख्या में हथियारबंद उग्रवादी रात के अंधेरे में आए और स्थानीय राजपूत समाज को निशाना बनाया। उनके खिलाफ हिंसक लाठी-डंडों और आगज़नी के साथ साज़िशपूर्वक षड्यंत्र रचा गया। कई लोगों को पीपल के पेड़ से बांधकर लटकाया गया, जिनमें बुजुर्ग महिलाएं, बच्चे और पुरुष शामिल थे। मात्र 2.5 वर्ष के मासूम से लेकर 105 वर्ष के वृद्धों तक को बर्बर तरीके से मारा गया। इस नरसंहार ने पूरे इलाके को दहलाकर रख दिया।स्थानीय निवासियों के मुताबिक, उस रात की खौफनाक स्थिति में कई परिवार पूरी तरह खत्म हो गए और गांव के कई हिस्सों में आगजनी कर दी गई। हजारों की संख्या में लोग विस्थापित हो गए, जबकि बचने वाले सदस्यों के जीवन में डर और आघात की कहानी हमेशा बनी रही।इस नरसंहार की जिम्मेदारी माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ने ली थी, जिसका बिहार की जातीय संघर्ष और राजनैतिक समीकरणों पर गहरा असर पड़ा। इस घटना ने बिहार की जातिगत राजनीति को कठोर रूप दे दिया, जहां समुदायों के बीच तनाव और अविश्वास की दीवारें मजबूत हुईं।

कांग्रेस की हुकूमत को लगा बड़ा झटका-

दलेलचक-बघौरा नरसंहार के बाद स्थानीय राजपूत समाज में कांग्रेस के प्रति गहरा आक्रोश और असंतोष फैल गया। जनता ने महसूस किया कि तत्कालीन सरकार इस तरह की भयावह हिंसा को रोकने में नाकाम रही। इस घटना के परिणामस्वरूप कांग्रेस पार्टी की बिहार में स्थायी राजनीतिक पकड़ कमजोर पड़ गई और दशकों तक उसे अपमानजनक चुनाव परिणामों का सामना करना पड़ा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नरसंहार बिहार के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में वह बिंदु था जिसने जातीय समीकरणों को बिगाड़ा और चुनावी रणनीतियों में जातीय समीकरणों को पहली बार इतनी मजबूती से प्रभावी किया।

आज भी घाटे की भरपाई नहीं-

33 वर्षों के बाद भी दलेलचक-बघौरा नरसंहार की यादें तरोताजा हैं। यद्यपि मुकदमों और न्यायिक कार्रवाईयों के कई प्रयास हुए, लेकिन पीड़ित परिवारों को अभी भी न्याय की तलाश है। उस दिन हुई हिंसा ने बिहार के सामाजिक ताने-बाने और स्थानीय सांप्रदायिक सद्भाव पर स्थायी प्रभाव डाला।विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों का समाधान सामाजिक संपर्क, पारदर्शी न्याय व्यवस्था और सामुदायिक मेल-जोल बढ़ाकर ही निकाला जा सकता है। बिहार को आज भी उस काले इतिहास की सीख लेकर आगे बढ़ना होगा ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

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