रिपोर्ट - ललित शर्मा
बुंदेलखंड की लोक संस्कृति में दिवारी नृत्य एक अनोखी और रंगीन परंपरा के रूप में अपनी विशेष जगह रखता है। यह नृत्य भगवान श्री कृष्ण की पौराणिक कथा से प्रेरित है, जिसमें वे गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा करते हैं। इस कथा का जश्न मनाने और उसकी याद दिलाने के लिए दिवाली के पर्व के बाद दिवारी नृत्य की शुरुआत होती है, जो लगभग ग्यारह दिनों तक चलता है।दिवारी नृत्य मुख्यतः बुंदेलखंड के हमीरपुर, जालौन, महोबा, और आसपास के जिलों में अत्यंत लोकप्रिय है। इसमें नर्तक सिर पर रंग-बिरंगे मोर पंख सजाते हैं और हाथों में लाठी लेकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर लयबद्ध होकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य वीरता, शक्ति और सामाजिक समर्पण का प्रतीक माना जाता है। बुजुर्गों द्वारा बच्चों और युवाओं को प्रशिक्षित कर इस लोक कला की निरंतरता सुनिश्चित की जा रही है। इससे न केवल सांस्कृतिक विरासत को जिंदा रखा जा रहा है बल्कि युवाओं में अपनी जड़ों और इतिहास के प्रति गर्व भी जागृत हो रहा है।हाल ही में हमीरपुर, चित्रकूट, और महोबा जिलों में दिवारी नृत्य के आयोजनों ने भारी उत्साह देखा है। स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों द्वारा इस कला को बढ़ावा देने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। मंदिरों के प्रांगणों, गाँवों के चौपालों और सांस्कृतिक मंचों पर नर्तकों ने दिवारी नृत्य के रंगीन और तीव्र प्रदर्शन से दर्शकों का मन मोह लिया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस लोक कला की प्रशंसा करते हुए कहा है कि दिवारी नृत्य बुंदेलखंड की सांस्कृतिक समृद्धि और युवाओं की प्रतिभा का प्रतीक है, जिसे हर संभव संरक्षण और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।इस प्रकार, दिवारी नृत्य बुंदेलखंड की महती सांस्कृतिक धरोहर के रूप में युवाओं को जोड़ने और सांस्कृतिक जागरूकता फैलाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। दीपावली के इस पावन अवसर पर दिवारी नृत्य का उत्सव युवा-पुराने सबको एकसाथ बांधता है और बुंदेलखंड की लोक कला की जीवंतता और समृद्धि को दर्शाता है।

